चिकनकारी

लखनऊ के चिकनकारी का बेगम नूरजहां से है पुराना नाता, जानिए दिलचस्प कहानी

नज़ाकत और नफ़सत का शहर लखनऊ अपने अद्भुत और स्वादिष्ट जायके के कारण दुनिया भर में एक अलग पहचान रखता है। इसके अलावा, एक कहावत भी बहुत प्रसिद्ध है कि लखनऊ में चिकन खाया और ले जाया जाता है।

वैसे आपको जानकर हैरानी होगी कि लखनऊ चिकनकारी की स्थापना मुगल सम्राट जहांगीर की बेगम नूरजहां ने की थी, जो ईरान से यह कला सीखकर भारत आई थीं।

उस समय चिकनकारी फुल ड्रेस में नहीं, बल्कि कैप, दुपट्टे या छोटी ड्रेस में ही की जाती थी। आज नूरजहाँ की ईरानी कला लखनवी कला बनकर विश्व भर में प्रसिद्ध हो गई है। जानकारों के मुताबिक चिकनकारी का लखनऊ में कारोबार लाखों का है।

चिकन फारसी शब्द “चाकिन” से निकला है।
लखनवी चिकनकारी में प्रयुक्त चिकन शब्द अपभ्रंश है। यह मूल रूप से एक फ़ारसी शब्द है जिसका अर्थ फ़ारसी में “चाकिन” है।

इसका मतलब होता है किसी भी कपड़े पर बेल बूट्स की कढ़ाई और कशीदाकारी, लेकिन भारत में यह शब्द “चाकिन” लोगों की जुबान पर चाकिन का चिकन बन गया।

ऐसे तैयार किया जाता है लखनवी चिकन
सुई और धागे से महीन कपड़े पर विभिन्न टांके की हस्तकला को लखनऊ की चिकन कला कहा जाता है। इसमें महीन सुइयों से कशीदाकारी करना और कच्चे सूत के धागों से रंगों को संसाधित करना शामिल है।

लगभग 40 प्रकार के जाल और जाल होते हैं, जैसे मुर्री, फुंदा, कांता, टेपची, पंखरी, लंबी जंजीरा, बंगला जाली, मुंद्राजी जाजी, सिद्दौर जाली, बुलबुल चश्मा जाली, आदि।

सबसे कठिन और मूल्यवान सिलाई नुकीला मुरी है, जिसे कच्चे सूत की तीन या पांच धागों की महीन सुई से सिल दिया जाता है। जिस कपड़े पर चिकनकारी बनाई जाती है उस पर सबसे पहले बूटा लिखा जाता है।

यानी लकड़ी के छापे पर मनचाहे बेल बूटों के डिजाइन खोदकर उन डिजाइनों को कच्चे रंगों से कपड़े पर छापा जाता है। इन नमूनों के आधार पर चिकनकारी बनने के बाद, उन्हें कुछ विशेष वाशिंग मशीन से धोया जाता है, जिससे कच्चा रंग पूरी तरह से साफ हो जाता है।

चिकनकारी के लिए लखनऊ में प्रसिद्ध है यह बाजार
लखनऊ आने वाला हर पर्यटक यहां चिकन के अच्छे कपड़े खरीदना नहीं भूलता। लखनऊ के बड़े चिकन बाजारों की बात करें तो सबसे बड़ा केंद्र चौकबाजार है। इसके अलावा अमीनाबाद और हजरतगंज में भी कई बड़े शोरूम हैं जहां चिकनकारी कपड़े मिलते हैं।

लखनऊ चिकनकारी हस्तशिल्प संघ के अध्यक्ष संजीव अग्रवाल ने कहा कि यह सच है कि नूरजहां चिकनकारी लाई थी, लेकिन इसके बारे में दो अलग-अलग कहानियां हैं।

कुछ लोगों का कहना है कि नूरजहाँ ईरान से सीखकर आई और फिर इस कला को लखनऊ में प्रसिद्ध किया। तो कोई कहता है कि दिल्ली से आई उसकी दासी कारीगरों को लाई, नूरजहाँ ने उन कारीगरों को रखा।

कुल मिलाकर दो अलग-अलग कहानियाँ नूरजहाँ का उल्लेख करती हैं।यह कहना गलत नहीं होगा कि चिकनकारी के पिता नूरजहाँ हैं। वहां चिकन क्लोदिंग के शोरूम मैनेजर हैदर अली खान ने कहा कि लखनऊ की चिकनकारी के कई लोग दीवाने हैं ।

यह भी पढ़ें :–

एनडीए राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के बारे में रोचक तथ्य

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.