अमेरिका - ईरान की लड़ाई की वजह

आइये जानते है अमेरिका – ईरान की लड़ाई की वजह और उससे जुड़े घटनाक्रम के बारे में

अभी पिछले शुक्रवार को अमेरिका ने ईरान के  बगदाद में एयर स्ट्राइक के जरिए ईरान के शीर्ष कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया । इसी के साथ ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है । अमेरिका के इस कार्यवाही के बदले जबाबी कार्यवाही ईरान करना चाहता है । ऐसे में पूरी दुनिया दो खेमें में बटती हुई नजर आ रही है ।

चलिए जानते हैं आखिर ईरान और अमेरिका के बीच विवाद की शुरुआत कब और कैसे हुई – दरअसल अमेरिका – ईरान विवाद की शुरुआत 1953 हुई थी और इसमें वक्त के साथ कई सारे घटनाक्रम जुड़ते गए और आज हालात ये बन गये हैं कि अमेरिका और इराक युद्ध के लिए तैयार हैं ।

अमेरिका और ईरान के बीच 1953 से जारी विवाद अब इतना ज्यादा गहराने लगा है कि मध्य पूर्व में युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं । ईरान के कमांडर सुलेमानी को मार के आने के बाद से ईरान ने बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर दो बार राकेट से हमला कर चुका है और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर ईरान बदले की कार्यवाही करेगा तो अमेरिका उसे तबाह कर देगा ।

अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी की शुरुआत 1953 से हुई जब अमेरिका और ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियां साथ मिलकर 1953 में ईरान में तख्तापलट करवाया था । ब्रिटेन और अमेरिका के खुफिया एजेंसी अपने फायदे के लिए ईरान में उस समय नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को सत्ता से बेदखल कर ईरान के शाह रजा पहलवी को गद्दी पर बैठाया था ।

इसके बाद अमेरिका और ब्रिटेन के उद्योगपतियों को काफी फायदा हुआ और वे ईरान से तेल का व्यापार करने लगे । जबकि उस समय ईरान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करना चाहते थे । हालांकि यह पूरी घटना शांतिपूर्वक हुई थी लेकिन इसके बाद से ईराक अमेरिका की विदेश नीति का हिस्सा बन गई ।

अमेरिका के 1953 में कराए गए तख्तापलट के बाद 1979 में ईरान की क्रांति हुई और शाह रजा पहलवी को हटा कर अयातोल्लाह रूहोल्लाह ख़ुमैनी को सौंपी गई । खुमैनी ईरान के पश्चिमीकरण करने और अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता के लिए शाह पहलवी को निशाने पर लेते थे । लेकिन सत्ता में आने के बाद खुमैनी की उदारता में परिवर्तन आया और वे खुद को वामपंथी आंदोलनों से अलग कर विरोधी आवाजों को दबाने और कुचलने लगे और इसी के साथ अमेरिका और ईरान के राजनयिक संबंध खत्म हो गए ।

इसके बाद 1979 में 13 इरानी छात्रों के एक समूह ने अमेरिकी दूतावास को अपने कब्जे में ले लिया और अमेरिका के 52 नागरिकों को एक साल से ज्यादा समय तक बंधक बनाकर रखा । कहा जाता है कि इस घटना को खुमैनी का समर्थन भी प्राप्त था । इसके बाद 1980 में इराक के सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला कर दिया और यह युद्ध करीब 8 सालों तक चला जिसमें ईरान और इराक के लगभग 5 लाख सैनिक मारे गए ।

इराक और ईरान के युद्ध में अमेरिका सद्दाम हुसैन के साथ था और सोवियत यूनियन भी सद्दाम हुसैन को मदद दे रहा था । सद्दाम हुसैन के खात्मे के साथ थोड़ा सा माहौल शांत हुआ । उसके बाद अमेरिका और ईरान के संबंध फिर से तनाव हो गए, जब 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जॉइंट कंप्रिहेंसिव प्लान आफ एक्शन बनाया ।

इसके बाद ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हुआ और ईरान ने परमाणु कार्यक्रमों को सीमित करने की बात मानी । लेकिन जैसे ही डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की सत्ता में आए उन्होंने एक तरफा फैसला लेते हुए इस समझौते को रद्द कर दिया और ईरान पर कई तरह के नए नए प्रतिबंध लागू कर दिए ।

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही दुनिया के सभी देशों को एक तरह से धमकी देते हुए कहा कि जो भी ईरान के साथ व्यापार करेगा वह अमेरिका से कारोबारी संबंध नहीं रख पाएगा । इसी के साथ अमेरिका और यूरोप के बीच मतभेद सामने आ गया और साथ ही ईरान और अमेरिका के रिश्ते तनावपूर्ण हो गए । सुलेमानी को मौत के घाट उतारने के बाद अब हालात यह है कि दोनों देश युद्ध के लिए आमदा है ।

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