एक महिला जो नक्सली संगठन छोड़ कर लौट आई मुख्यधारा में

एक महिला जो नक्सली संगठन छोड़ कर लौट आई मुख्यधारा में : अब पढ़ा रही है बच्चों को

कहा जाता है कि ज्ञान की सार्थकता तभी होती है जब उसका सही तरीके से उपयोग सृजन में किया जाए । आज हम एक ऐसे ही कहानी की बात करने जा रहे हैं जो कभी नक्सलियों के साथ रह कर लोगो की जान लेती थी । एक नक्सली महिला है जिसने आत्मसमर्पण कर दिया है और अब उसे इस बात से बड़ा सुकून मिलता है कि जिन हाथों में पहले वह बंदूकें चलाती थी और वह कभी मौत देती थी, आज अब उसी हाथ में चाक और डस्टर हैं और वह बच्चों को पढ़ा कर उनकी जिंदगी संवार रही है ।

एक वक्त था जब लोग उससे नफरत करते थे । लेकिन आज उसे लोगों से सम्मान मिलता हैं । इस नक्सली महिला ने अपने पिता की मौत के बाद इसका अपने संगठन से मोहभंग हो गया और वह मुख्यधारा में लौट कर अपनी जिंदगी और अपने ज्ञान को सार्थक बनाने में जुट गई हैं ।

वह जिस गांव में पैदा हुई थी वहां लोकतंत्र के बजाय क्रांति के गीत गूंजते थे । इस महिला ने दसवीं कक्षा तक पढ़ने के बाद ही पढ़ाई के दौरान बंदूक थाम ली थी । खेलकूद में काफी तेज थी । उसके नक्सली संगठन ने उसे अक्षर ज्ञान से वंचित कर नक्सलियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दे दी ।

इतना ही नहीं वह नक्सलियों के उस स्कूल में पढ़ाती थी जहां कि बच्चों को अक्षर के ज्ञान के साथ क्रांतिकारी पाठ पढ़ाया जाता था । यह महिला आज भी पढ़ा ही रही है लेकिन उसका ज्ञान संहार नहीं बल्कि सृजन में है । यह महिला अपने पिता की मौत के बाद अपना संगठन छोड़ने का निर्णय लिया और ऐसे में उसे रेडियो ने राह दिखाई । रेडियो पर प्रसारित समाचार के जरिए उस महिला को सरकार की पुनर्वास नीति के बारे में पता चला ।

इसके बाद वह जंगल से भाग आई और सितंबर 2018 में उसने  कोड़ागांव एसपी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया । 25 जून 2019 को सरकार ने उसे गोपनीय सैनिक बना दिया जिसके बदले में उसे कुछ मानदेय मिलता है । आज अब यह महिला दोहरी भूमिका निभाकर बहुत ही खुश है । आत्मसमर्पण करने के बाद इस महिला को इस बात से डर नहीं लगता कि नक्सलियों का वह निशाना बनाई जा सकती है और मारी जा सकती है ।

इस विषय पर वह कहती है मरना तो सभी को एक दिन है ही । इसलिए वहां नक्सली संगठन में रहकर मरने से अच्छा यहां रह कर मर जाए । दोनों में बहुत फर्क है । वह आज के समय में करीब 50 बच्चों को पढ़ाती है जो पुलिस लाइन और आसपास के बस्तियों के बच्चे हैं ।

इस संदर्भ में कोड़ा गांव के पुलिस अधीक्षक सुजीत कुमार का कहना है कि काम के प्रति इस महिला के लगन और समर्पण को देखते हुए बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी इसे सौंपी गई है । आगे रायपुर की तर्ज पर कोड़ागांव में भी पुलिस विभाग द्वारा एक विद्यालय खोला जाएगा जहां पर इसे बतौर शिक्षक नियुक्त करेंगे ।

इस महिला ने नक्सली संगठन में रहते हुए जब अपनी पिता के मृत्यु को देखा तो उसका नजरिया बदला और वह नक्सली संगठन छोड़कर मुख्यधारा में लौट आई और आज बच्चों को पढ़ा कर उनकी जिंदगी संवारने का काम कर रही है ।

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