क्या फिर से आर्केटिक पर बर्फ जमेगी..!!

आर्कटिक की बर्फ काफी तेजी से पिघलना शुरू हो गई है । अब इसे फिर से दोबारा जमाया जाने वाला है ! दुनिया भर में वैज्ञानिकों के अब एक नई बहस छिड़ गई है कि जैसे धरती पर कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने के लिए पेड़ लगाए जा रहे हैं , क्या उसी तरह कोई ऐसा रास्ता भी है जिससे आर्केटिक की पिघलती बर्फ को दोबारा से जमाया जाना संभव हो सके ?

इंडोनेशियाई डिज़ाइनर के मुताबिक आर्कटिक की पिघलती बर्फ को दोबारा से जमाना संभव है ।  आइसबर्ग यानी कि समुद्र में तैरती बर्फ की चट्टान बनाने वाली पनडुब्बी की सहायता से ऐसा किया जा सकता है । चलिए जानते हैं यह कैसे संभव होगा कि आर्कटिक की पिघलती बर्फ फिर से जमाया जाए –

इंटरनेशनल डिजाइन प्रतियोगिता में इस डिज़ाइनर के प्रस्ताव को दूसरा स्थान हासिल हुआ है । यह डिजाइनर इंडोनेशिया का है । इंडोनेशियाई डिजाइनर 29 साल के फारिस रज्जाक ने बताया कि आर्कटिक की बर्फ को दुबारा से जमाने के लिए  सबमर्सिबल लगी पनडुब्बी का इस्तेमाल किया जाएगा ।

यह  पनडुब्बी 16 फ़ीट मोटी और 82 फीट चौड़ी हेक्सागोनल आइसबर्ग को बनाने की क्षमता होगी ।फारिस के मुताबिक इस पनडुब्बी को समुद्र की तलहटी तक ले जाया जाएगा जहां से उसमें पानी भर जाएगा ।पानी भर जाने के बाद विशेष प्रक्रिया की सहायता से उसमें से नमक अलग कर लिया जाएगा ।

जिसके बाद पानी के तापमान को -15 डिग्री सेल्सियस पर ले जाया जाएगा ।  इस प्रक्रिया को करने के लिए जिस कंटेनर का इस्तेमाल होगा इसको सूर्य की किरणों से दूर रखा जाएगा ।

इंडोनेशियाई डिजाइनर फारिस के मुताबिक कंटेनर में एक महीने के अंदर हेक्सागोनल आकार का आइसबर्ग अपने आप तैयार हो जाएगा । डिज़ाइनर ने इस आइसबर्ग को आइस बेबी का नाम दिया है । आइस बर्ग बनाने का डिजाइन अभी अपने शुरुआती स्टेज में है ।

इसके डिजाइन ने यह नहीं बताया है कि इसको ऊर्जा कहां से मिलेगी । कई वैज्ञानिकों ने सवाल उठाया है कि क्या यह पनडुब्बी इस थ्योरी पर काम कर सकती है । वही ब्रिटेन के लीड्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एंड्रयू शेफर्ड का मानना है कि यह एक बेहतरीन आईडिया है ।

अगर ऐसा हो जाता है तो इसका धरती के तापमान पर भी असर पड़ेगा । इससे बर्फ पिघलना और समुद्र तल का बढ़ना भी थम जाएगा । लेकिन पिछले 40 सालों में कितनी बर्फ पर हुई है उसकी भरपाई करने के लिए लगभग एक करोड़ पनडुब्बियों की जरूरत पड़ेगी ।

फारिस का कहना है कि आर्कटिक की बर्फ हर साल कम हो रही है इसकी भरपाई के लिए हमें नए तरीकों पर विचार करना होगा । अमीर देश बर्फ को पिघलने से रोकने के लिए सी वाल (see wall) पर खर्च कर रहे हैं लेकिन गरीब देशों के पास समुद्र का स्तर बढ़ने से रोकने के लिए कोई बजट नहीं है ।

इसके लिए हमें अलग नजरिए से सोचना होगा । मालूम हो कि आर्कटिक दुनिया का सबसे पुराना और स्थिर बर्फ और इलाका द लास्ट आइस एरिया काफी तेजी से पिघल रहा है । आर्कटिक की बर्फ पिघल कर अब सिर्फ 9.99लाख वर्ग किलोमीटर ही बची है ।

अगर इसके पिघलने की दर यही रही तो 2030 तक आर्कटिक की बर्फ पिघल कर खत्म हो जाएगी । आर्कटिक की बर्फ पिघलने की वजह से समुद्र जलस्तर में बढ़ोत्तरी भी हो रही है जिससे समुद्र के तटीय इलाकों के जलमग्न होने का खतरा बढ़ रहा है ।

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