फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह नहीं रहे, उनकी जिंदगी से हम यह सबक सीख सकते हैं

फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह नहीं रहे

फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह नहीं रहे

भारत के लीजेंड स्प्लिटर मिल्खा सिंह का शुक्रवार देर रात निधन हो गया। उन्हें फ्लाइंग सिख के नाम से भी जाना जाता था। मिल्खा सिंह 91 साल के थे।

कोरोना वायरस से संक्रमित होने के चलते उन्हें चंडीगढ़ के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हॉस्पिटल में लगभग 15 दिनों से एडमिट थे लेकिन उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी और देर रात उनका निधन हो गया।

ऐसे में पूरा देश सदमे में है। सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी और आम लोगों को भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं। मिल्खा सिंह की जिंदगी से हम कई सारी बातें सीख सकते हैं जो इस तरह से हैं –

अपनी परेशानियों से निकलने के लिए साहस जुटाया –

मिल्खा सिंह का जन्म अविभाज्य भारत में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। मिल्खा सिंह का जन्म गोविंदपुरा पाकिस्तान में हुआ था। उनका जीवन कठिनाइयों से भरा पड़ा रहा है।

बचपन में उन्होंने कई कठिनाइयों का सामना किया। बचपन में उनके साथ कुछ ऐसी घटनाएं हुआ जो बेहद डराने वाली बात कहीं जा सकती हैं। मिल्खा सिंह ने अपने देश को रातों-रात विखरते देखा है।

उन्होंने देश का विभाजन देखा है, दंगे देखे हैं यहां तक कि अपने खुद के माता-पिता का सिर कलम होते हुए देखा है। उस समय उनके पास अपने गांव से भागने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

वह यह सब देखकर अपने गांव से भाग जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद वह परेशानियों उनकी जिंदगी का हिस्सा रही। लेकिन वहां अपनी कड़ी मेहनत से अपना सुनहरा भविष्य बनाया।

खुद पर विश्वास करें –

मिल्खा सिंह काफी लंबे समय तक अपनी बहन और साले के साथ दिल्ली में शरणार्थी शिविर में रह रहे थे। इसके बाद वह सेवा भारतीय सेना में शामिल हो जाते हैं। यहीं पर उन्हें एथलीट के रूप में अपना कैरियर बनाने का मौका मिलता है।

सभी कैंडिडेट के बीच क्रॉस कंट्री रेस होती है और यह रेस जीतने वाले को स्टेट लेवल पर भेजा जाना था। मिल्खा सिंह सभी राउंड क्लियर करते हैं। सभी राउंड क्लियर करने के पीछे सबसे बड़ी वजह थी  कि उन्हें विश्वास खुद पर था कि वह यह काम कर सकते हैं।

कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं –

मिल्खा सिंह बहुत कम उम्र में ही भारतीय सेना में शामिल होने का सपना सजाने लगे थे। हालांकि पहली बार में उन्हें सफलता नहीं मिली थी। पहले तीन बार उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा था।

लेकिन उन्होंने इसके बावजूद हार नहीं मानी। इसके बाद उन्हें स्टेट लेवल के लिए चुना गया तो सेना में ट्रेनिंग को भी पूरा करना था। वह दोनों जगह लगातार मेहनत कर रहे थे।

वह अपनी ताकत और इस गलतियों को सुधारने के लिए लगातार कोशिश की। आखिर में वह मौका भी आता है जब उसे इंटरनेशनल खेल के आयोजन में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलता है।

याद रखें जिन्होंने आप का साथ दिया हो –

मिल्खा सिंह का जब स्टेट लेवल के लिए चयन होता था तो उन्हें एक कोच चुना गया। उन्होंने ही उन्हें सारी बारीकियां शुरू से सिखाई। उन्हें कोच ने ही नुकीले जूते पहन कर दौड़ना सिखाया।

वह एक कोच होने के अलावा वह उनके चीयरलीडर भी थे। उनके मार्गदर्शन में ही मिल्खा सिंह इंटरनेशनल टूर्नामेंट में भाग ले सके थे। 400 मीटर विश्व रिकॉर्ड को तोड़ने के बाद मिल्खा सिंह अपने कोच के पास वापस आते हैं और आभार जताने के लिए अपने कोच को अपना पदक सोप देते हैं।

सफलता का मतलब पुरस्कार और सम्मान नहीं –

मिल्खा सिंह की पहचान एक भारतीय एथलीट के रूप में है। उन्होंने अपने आप को भारतीय केथलिक के रूप पहचान बनाई। उन्होंने अपने एथलीट के कैरियर के दौरान कई पदक जीते हैं।

हालांकि आज उनके पास उनमें से कोई भी पदक नहीं है। उन्होंने अपनी ट्रॉफी और पदक को सजिने के बजाय उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को दान में देने का फैसला किया, जो इस बात को दर्शाता है कि सफलता का मतलब पुरस्कार और सम्मान से भी कहीं ज्यादा होता है।

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