अधिक कार्बन डाइऑक्साइड इंसानों की सोचने समझने की क्षमता पर डालता है असर

वातावरण में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड इंसानों की सोचने समझने की क्षमता पर डालता है असर

कार्बन डाई ऑक्साइड सोचने समझने की क्षमता पर असर डालती है इस बात का खुलासा जनरल जिओ हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है जो यूनिवर्सिटी आफ कोलोरेडो द्वारा किया गया है, जिसमें बताया गया है कि अगर वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर ज्यादा है तब यह इंसानों के सोचने और समझने की क्षमता को प्रभावित करता है। मालूम हो कि वातावरण में बाहर तो कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ा हुआ देखने को मिलता है लेकिन घरों के अंदर भी कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ा हुआ स्तर पाया जाता है।

वही इस शोध में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि 21वीं सदी के अंत तक घरों के अंदर ही कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 1400 पीपीएम के स्तर तक पहुंच सकता है। यह वर्तमान समय में बाहरी वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर से लगभग 10 गुना है। इस शोध में बताया गया है कि मोनालोवा ऑब्जर्वेटरी के आंकड़े के अनुसार कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर हवाई में 415.6 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) तक पहुंच चुका है।

कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में यह वृद्धि औद्योगिक क्रांति के बाद लगातार बढ़ती ही जा रही है और इसी के आधार पर यह अनुमान जताया गया है कि 21वीं सदी के अंत तक वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ कर 930 पीपीएम तक हो सकता है । वहीं अगर शहरी इलाकों की बात करें तो यह बढ़कर 1030 तक पहुंच जाने की संभावना है ।

वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ा हुआ स्तर लोगों के सोचने समझते के साथ ही उनके निर्णय लेने की क्षमता को भी काफी हद तक प्रभावित कर देता है। वैज्ञानिकों ने अनुमान जताया है कि अगर वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 1400 से अधिक हो जाएगा तब इससे इंसानों की सामान्य बुद्धि में 25 फ़ीसदी की गिरावट देखने को मिल सकती है यानी कि एक चौथाई बुद्धि कम हो जाएगी।

वहीं अगर बात करें निर्णय लेने तो यहां करीब आधा हो जाने की संभावना है। इस शोध को करने वाले शोधकर्ता क्रिस करनोसर के अनुसार कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ा हुआ स्तर न केवल बच्चों पर असर करेगा बल्कि यह आम इंसान, व्यापारी, वैज्ञानिक, शिक्षक, निर्माता लगभग सभी पर असर डालेगा।

कैसे असर करेगा : –

यूनिवर्सिटी आफ कोलोरेडो के प्रोफेसर विलियम मिल ने बताया कि किसी बिल्डिंग में वेंटिलेशन बहुत ज्यादा जरूरी होता है जिससे इमारतों में हवा पहुंचती रहे और कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर नियंत्रण में रहे। लेकिन जब उस बिल्डिंग में ज्यादा लोग रहते हैं तब सभी के लिए पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं हो पाते हैं और ज्यादा लोगों के सांस लेने की वजह से उस बिल्डिंग में अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्पादन भी होता है।

जब यह कार्बन डाइऑक्साइड हमारे ब्लड में पहुंचता है तब यह दिमाग तक पहुंचने वाली ऑक्सीजन को प्रभावित करता है जिसके वजह से लोगों को नींद आने लगती है, साथ ही दिमाग की तनाव भी बढ़ जाता है। इस सबका असर इंसान के सोचने और समझने की क्षमता के साथ ही निर्णय लेने की क्षमता पर भी पड़ने लगता है। शोधकर्ताओं के अनुसार ग्रामीण घरों में  की अपेक्षा शहरी घरों में घर के बाहर की तुलना में घर के अंदर ही कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अधिक पाई जाती है ।

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सामान्यता किसी बिल्डिंग के अंदर और बाहर कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बराबर होती है लेकिन जब किसी बिल्डिंग में अधिक लोग रहते हैं तो उनके सांस लेने की वजह से कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लग जाता है। ऐसे में घरों के अंदर के कार्बन डाई ऑक्साइड के स्तर को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। घरों के अंदर कार्बन डाइऑक्साइड के हानिकारक स्तर तक पहुंचने से पहले अगर इन्हें कम कर लिया जाए तो यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा।

वातावरण में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड इंसानों की सोचने समझने की क्षमता पर डालता है असर
वातावरण में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड इंसानों की सोचने समझने की क्षमता पर डालता है असर

इसे कम करने के लिए सबसे पहला काम जीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन में कमी लाना होगा और इसका पालन करने की बात पेरिस समझौते में भी कही गई है, लेकिन जब सभी लोग इसका अच्छी तरीके से पालन करेंगे तब यह नियंत्रण में नही हो पाएगा।

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शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके यह नतीजे शुरुआती तौर के हैं अभी इस पर और ज्यादा काम करने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभाव का अध्ययन अभी नहीं आया है। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ा हुआ स्तर लोगों के सोचने और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है लेकिन इसे और ज्यादा अध्ययन की जरूरत है क्योंकि यह और भी ज्यादा जटिल हो सकता है ।

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